The future of AI and the power of Sanskrit
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Date
2026-02-21
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DD News
डीडी न्यूज
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Abstract
Description
This event was organized to present an exclusive conversation with Prof. Shrinivasa Varakhedi on the intersection of Artificial Intelligence (AI) and Sanskrit. The discussion highlighted how ancient Indian philosophical concepts such as Buddhi and Prakriti provide a meaningful framework for understanding AI in the modern era. It emphasized that simple digitization of Sanskrit texts is not enough; AI must also understand deeper elements like Rasa, music, and bhakti bhava. The session stressed the importance of training AI through traditional Indian analytical systems like Mimamsa and encouraged scholars to actively participate in “Train AI” initiatives. The overall vision is to develop a responsible and Sattvic AI that preserves and promotes the richness of Indian Knowledge Systems.
यह कार्यक्रम कृत्रिम बुद्धिमत्ता और संस्कृत के अंतर्संबंध पर प्रो. श्रीनिवास वरखेडी के साथ एक विशेष संवाद प्रस्तुत करने के लिए आयोजित किया गया था। इस चर्चा में यह रेखांकित किया गया कि बुद्धि और प्रकृति जैसे प्राचीन भारतीय दार्शनिक सिद्धांत आधुनिक युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को समझने के लिए एक सार्थक आधार प्रदान करते हैं। इसमें इस बात पर बल दिया गया कि संस्कृत ग्रंथों का केवल डिजिटलीकरण पर्याप्त नहीं है; कृत्रिम बुद्धिमत्ता को रस, संगीत और भक्ति भाव जैसे गहन तत्वों को भी समझना आवश्यक है। सत्र में मीमांसा जैसे पारंपरिक भारतीय विश्लेषणात्मक तंत्रों के माध्यम से कृत्रिम बुद्धिमत्ता को प्रशिक्षित करने के महत्व पर जोर दिया गया तथा विद्वानों को इसे प्रशिक्षित करने की पहल में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया। समग्र दृष्टि एक उत्तरदायी और सात्त्विक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास की है, जो भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्धि का संरक्षण और संवर्धन कर सके।
यह कार्यक्रम कृत्रिम बुद्धिमत्ता और संस्कृत के अंतर्संबंध पर प्रो. श्रीनिवास वरखेडी के साथ एक विशेष संवाद प्रस्तुत करने के लिए आयोजित किया गया था। इस चर्चा में यह रेखांकित किया गया कि बुद्धि और प्रकृति जैसे प्राचीन भारतीय दार्शनिक सिद्धांत आधुनिक युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता को समझने के लिए एक सार्थक आधार प्रदान करते हैं। इसमें इस बात पर बल दिया गया कि संस्कृत ग्रंथों का केवल डिजिटलीकरण पर्याप्त नहीं है; कृत्रिम बुद्धिमत्ता को रस, संगीत और भक्ति भाव जैसे गहन तत्वों को भी समझना आवश्यक है। सत्र में मीमांसा जैसे पारंपरिक भारतीय विश्लेषणात्मक तंत्रों के माध्यम से कृत्रिम बुद्धिमत्ता को प्रशिक्षित करने के महत्व पर जोर दिया गया तथा विद्वानों को इसे प्रशिक्षित करने की पहल में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया। समग्र दृष्टि एक उत्तरदायी और सात्त्विक कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास की है, जो भारतीय ज्ञान परंपरा की समृद्धि का संरक्षण और संवर्धन कर सके।
