19th World Sanskrit Conference in Kathmandu, Nepal
Date
2025-06-30
Journal Title
Journal ISSN
Volume Title
Publisher
Central Sanskrit University, New Delhi
केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
Abstract
Description
19th World Sanskrit Conference in Kathmandu, Prof. Shrinivasa Varakhedi, Vice-Chancellor of Central Sanskrit University, highlighted Sanskrit’s eternal relevance as a living and contemporary knowledge tradition. He explained its intellectual depth through five streams—Śrutam, Dṛṣṭam, Matam, Prāptam, and Kṛtam—and emphasized its potential in modern fields like Artificial Intelligence. Stressing multilingual dialogue, he called for integration with Pali, Prakrit, and other Indian languages. He also underlined the relevance of ancient Sanskrit ideals like “Sarve Bhavantu Sukhinah” for global peace. His address reflected Sanskrit’s rich heritage and contemporary significance.
19वें विश्व संस्कृत सम्मेलन, काठमांडू के अवसर पर केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेडी ने अपने उद्बोधन में संस्कृत की शाश्वत प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए इसे एक जीवंत व समकालीन ज्ञान परंपरा बताया। उन्होंने "श्रुतम्, दृष्टम्, मतम्, प्राप्तम्, कृतम्" जैसी पाँच प्रमुख ज्ञान धाराओं के माध्यम से संस्कृत की बौद्धिक गहराई को समझाया और इसके आधुनिक तकनीकी क्षेत्रों, विशेषकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता में संभावित योगदान की चर्चा की। उन्होंने पाली, प्राकृत व अन्य भारतीय भाषाओं के साथ संस्कृत के समन्वय की आवश्यकता और बहुभाषिक संवाद को आज के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण बताया। वैश्विक शांति के लिए "सर्वे भवन्तु सुखिनः" जैसे प्राचीन सूत्रों की प्रासंगिकता को उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया। यह संबोधन संस्कृत की गौरवशाली परंपरा और उसकी समकालीन उपयोगिता का प्रभावी परिचायक रहा।
19वें विश्व संस्कृत सम्मेलन, काठमांडू के अवसर पर केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वरखेडी ने अपने उद्बोधन में संस्कृत की शाश्वत प्रासंगिकता को रेखांकित करते हुए इसे एक जीवंत व समकालीन ज्ञान परंपरा बताया। उन्होंने "श्रुतम्, दृष्टम्, मतम्, प्राप्तम्, कृतम्" जैसी पाँच प्रमुख ज्ञान धाराओं के माध्यम से संस्कृत की बौद्धिक गहराई को समझाया और इसके आधुनिक तकनीकी क्षेत्रों, विशेषकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता में संभावित योगदान की चर्चा की। उन्होंने पाली, प्राकृत व अन्य भारतीय भाषाओं के साथ संस्कृत के समन्वय की आवश्यकता और बहुभाषिक संवाद को आज के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण बताया। वैश्विक शांति के लिए "सर्वे भवन्तु सुखिनः" जैसे प्राचीन सूत्रों की प्रासंगिकता को उन्होंने विशेष रूप से रेखांकित किया। यह संबोधन संस्कृत की गौरवशाली परंपरा और उसकी समकालीन उपयोगिता का प्रभावी परिचायक रहा।